आज के दिन एक खास बात बताना चाहता हूँ।
वैसे तो कहने को हम बहुत अच्छे लोग बनकर अक्सर महिलओं के सम्मान के विषय में बात करते हैं लेकिन गाहे - बगाहे हम मजे ले ही लेते हैं..।
लेकिन मैं बताना चाहता हूँ कि हमें क्यों उनका सम्मान करना चाहिए ?
हमें अपने वेद और उपनिषद से बहुत कुछ सीखने को मिलता है , ये अलग बात है कि उनको पढ़ने पढाने वाले भी महिलाओं की कोई ख़ास इज़्ज़त नहीं करते । लेकिन जहाँ अच्छी बात हो उसकोजानना चाहिए।
हमारे वेदों में पूर्ण सिर्फ ईश्वर को कहा गया है। अथर्ववेद में कहा गया है,
‘पूर्णात्पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते।’
इसका अर्थ यह है कि पूर्ण से पूर्ण का उदय होता है, पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा सींचा जाता है।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि वो ईश्वर ही है जो पूर्ण को जन्म देता है और उसको सींचता है। ईश्वर को किसने देखा है ? शायद किसी ने नहीं, किन्तु ईश्वर का स्वरुप और लक्षण किसी में दिखता है तो वह केवल और केवल 'नारी' है।
हम उस ईश्वर का कितना सम्मान करते हैं जो एक पत्थर में है, अथवा है भी कि नहीं, पता नही। उस भगवान से हम कितना डरते हैं , कितना सम्मान करते हैं । लेकिन उस भगवान का अनादर आसानी से कर देते हैं जो हमारे सामने है।
और जानकारी के लिए बता दूं कि वेद ऐसे भगवान में विश्वास नही करता । वेद में राम कृष्ण कि कहीं चर्चा नहीं है जिसके लिए मार-काट हो रहा है। वैसे भगवान लोगों का भी ट्रेंड चलता है। पहले वैष्णो देवी का ट्रेंड था आज कल साईं बाबा का चल रहा है। विषयान्तर हो गया , वेद सिर्फ प्रत्यक्ष ईश्वर में विश्वास करता है। जैसे - सूर्य, हवा,पानी इत्यादि। इनका अपमान भी हम बड़ी आसानी से कर लेते हैं। जैसे- इनको गन्दा करना या इनकी बर्बादी करना ।
अब एक दूसरा उदहारण देता हूँ। ईशावास्योपनिषद में एक प्रसिद्ध मंत्र है-
ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
इस मंत्र का सरल अर्थ है कि वह (ईश्वर) पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण ही उत्पन्न होता है। और यदि पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लें, तो भी पूर्ण ही शेष बचता है।
यह मंत्र इसलिए भी प्रसिद्ध है कि यह गणित के उस सूत्र को चुनौती देता है जो यह कहता है कि 9-9=0 या बड़े स्तर पे कहें तो ∞-∞=0 होना चाहिए किन्तु इस मंत्र के हिसाब से ∞-∞=∞ होता है जो कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कही देखने को नहीं मिलता है।
लेकिन ईश्वर कि यह सत्ता हमें इस पृथ्वी लोक पर देखने को मिलती है। एक नारी खुद पूर्ण है, एक पूर्ण बच्चे को जन्म देती है और फिर भी पूर्ण रहती है ।
अतः 'नारी' ही ईश्वर है , मतलब 1-1=1
और भी उदहारण हैं। हमारे घरों में महिलाएं रोज पूजा करती हैं। हमारे धर्म में कई नाम के ईश्वर हैं और सबकी चालीसा आरती इत्यादि पढ़ी जाती है। आप कोई भी एक आरती उठाकर देख लें , उसकी आखिरी पंक्ति में लिखा होता है कि - फलाने जी कि आरती जो कोई 'नर' गावे, फलाना फलाना फलाना चीज पावे। इसमें कहीं भी ये क्यों नही लिखा कि जो कोई नारी गावे ? क्योकि नारी खुद ही ईश्वर का स्वरुप है।
अब बात आ जाती है मर्दानगी पर। बेचारे उन मर्दों को ये भी पता नही होता कि हर मनुष्य अपने माता और पिता के 23-23 गुणसूत्रों (chromozomes) से बनता है। अर्थात हर पुरुष-नारी में आधा पुरुष और आधी नारी होती है।
अतः एक नारी हमेशा सम्माननीय है और उनका सम्मान करना चाहिए । सभी नारियों को विश्व नारी दिवस की शुभकामनाएँ जिनकी वजह से इस दुनियां का स्तित्व है ।
वैसे तो कहने को हम बहुत अच्छे लोग बनकर अक्सर महिलओं के सम्मान के विषय में बात करते हैं लेकिन गाहे - बगाहे हम मजे ले ही लेते हैं..।
लेकिन मैं बताना चाहता हूँ कि हमें क्यों उनका सम्मान करना चाहिए ?
हमें अपने वेद और उपनिषद से बहुत कुछ सीखने को मिलता है , ये अलग बात है कि उनको पढ़ने पढाने वाले भी महिलाओं की कोई ख़ास इज़्ज़त नहीं करते । लेकिन जहाँ अच्छी बात हो उसकोजानना चाहिए।
हमारे वेदों में पूर्ण सिर्फ ईश्वर को कहा गया है। अथर्ववेद में कहा गया है,
‘पूर्णात्पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते।’
इसका अर्थ यह है कि पूर्ण से पूर्ण का उदय होता है, पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा सींचा जाता है।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि वो ईश्वर ही है जो पूर्ण को जन्म देता है और उसको सींचता है। ईश्वर को किसने देखा है ? शायद किसी ने नहीं, किन्तु ईश्वर का स्वरुप और लक्षण किसी में दिखता है तो वह केवल और केवल 'नारी' है।
हम उस ईश्वर का कितना सम्मान करते हैं जो एक पत्थर में है, अथवा है भी कि नहीं, पता नही। उस भगवान से हम कितना डरते हैं , कितना सम्मान करते हैं । लेकिन उस भगवान का अनादर आसानी से कर देते हैं जो हमारे सामने है।
और जानकारी के लिए बता दूं कि वेद ऐसे भगवान में विश्वास नही करता । वेद में राम कृष्ण कि कहीं चर्चा नहीं है जिसके लिए मार-काट हो रहा है। वैसे भगवान लोगों का भी ट्रेंड चलता है। पहले वैष्णो देवी का ट्रेंड था आज कल साईं बाबा का चल रहा है। विषयान्तर हो गया , वेद सिर्फ प्रत्यक्ष ईश्वर में विश्वास करता है। जैसे - सूर्य, हवा,पानी इत्यादि। इनका अपमान भी हम बड़ी आसानी से कर लेते हैं। जैसे- इनको गन्दा करना या इनकी बर्बादी करना ।
अब एक दूसरा उदहारण देता हूँ। ईशावास्योपनिषद में एक प्रसिद्ध मंत्र है-
ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
इस मंत्र का सरल अर्थ है कि वह (ईश्वर) पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण ही उत्पन्न होता है। और यदि पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लें, तो भी पूर्ण ही शेष बचता है।
यह मंत्र इसलिए भी प्रसिद्ध है कि यह गणित के उस सूत्र को चुनौती देता है जो यह कहता है कि 9-9=0 या बड़े स्तर पे कहें तो ∞-∞=0 होना चाहिए किन्तु इस मंत्र के हिसाब से ∞-∞=∞ होता है जो कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कही देखने को नहीं मिलता है।
लेकिन ईश्वर कि यह सत्ता हमें इस पृथ्वी लोक पर देखने को मिलती है। एक नारी खुद पूर्ण है, एक पूर्ण बच्चे को जन्म देती है और फिर भी पूर्ण रहती है ।
अतः 'नारी' ही ईश्वर है , मतलब 1-1=1
और भी उदहारण हैं। हमारे घरों में महिलाएं रोज पूजा करती हैं। हमारे धर्म में कई नाम के ईश्वर हैं और सबकी चालीसा आरती इत्यादि पढ़ी जाती है। आप कोई भी एक आरती उठाकर देख लें , उसकी आखिरी पंक्ति में लिखा होता है कि - फलाने जी कि आरती जो कोई 'नर' गावे, फलाना फलाना फलाना चीज पावे। इसमें कहीं भी ये क्यों नही लिखा कि जो कोई नारी गावे ? क्योकि नारी खुद ही ईश्वर का स्वरुप है।
अब बात आ जाती है मर्दानगी पर। बेचारे उन मर्दों को ये भी पता नही होता कि हर मनुष्य अपने माता और पिता के 23-23 गुणसूत्रों (chromozomes) से बनता है। अर्थात हर पुरुष-नारी में आधा पुरुष और आधी नारी होती है।
अतः एक नारी हमेशा सम्माननीय है और उनका सम्मान करना चाहिए । सभी नारियों को विश्व नारी दिवस की शुभकामनाएँ जिनकी वजह से इस दुनियां का स्तित्व है ।

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